Novel192550 chapters27h 37m total

Rangbhoomi

रंगभूमि

Rangbhoomi (रंगभूमि) by Premchand is an epic novel about Surdas, a blind beggar who resists British industrialization to protect his ancestral land and community.

Characters:Surdas, John Sevak, Sophia, Raja Bharatsingh, Vinay Singh, Prabhu Sevak
Setting:Colonial India, early 20th century industrial town

Chapter 46 of 50

11 min read • 1,535 words

अध्याय 46: रंगभूमि

चारों आदमी शफाखाने पहुँचे, तो नौ बज चुके थे। आकाश निद्रा में मग्न, ऑंखें बंद किए पड़ा हुआ था, पर पृथ्वी जाग रही थी। भैरों खड़ा सूरदास को पंखा झल रहा था। लोगों को देखते ही उसकी ऑंखों से ऑंसू गिरने लगे। सिरहाने की ओर कुर्सी पर बैठी हुई सोफिया चिंताकुल नेत्राों से सूरदास को देख रही थी। सुभागी ऍंगीठी में आग बना रही थी कि थोड़ा-सा दूधा गर्म करके सूरदास को पिलाए। तीनों ही के मुख पर नैराश्य का चित्रा खिंचा हुआ था। चारों ओर वह नि:स्तब्धाता छाई हुई थी, जो मृत्यु का पूर्वाभास है।

सोफी ने कातर स्वर में कहा-पंडाजी, आज शोक की रात है। इनकी नाड़ी का कई-कई मिनटों तक पता नहीं चलता। शायद आज की रात मुश्किल से कटे। चेष्टा बदल गई।

भैरों-दोपहर से यही हाल है; न कुछ बोलते हैं, न किसी को पहचानते हैं।

सोफी-डॉक्टर गांगुली आते होंगे। उनका तार आया था कि मैं आ रहा हूँ। यों तो मौत की दवा किसी के पास नहीं; लेकिन सम्भव है,डॉक्टर गांगुली के हाथों कुछ यश लिखा हो।

सुभागी-मैंने शाम को पुकारा था, तो ऑंखें खोली थीं; पर बोले कुछ नहीं।

ठाकुरदीन-बड़ा प्रतापी जीव था।

यही बातें हो रही थीं एक मोटर आई और कुँवर भरतसिंह, डॉक्टर गांगुली और रानी जाह्नवी उतर पड़ीं। गांगुली ने सूरदास के मुख की ओर देखा और निराशा की मुस्कराहट के साथ बोले-हमको दस मिनट का भी देर होता, तो इनका दर्शन भी न पाते। विमान आ चुका है। क्यों दूधा गरम करता है भाई, दूधा कौन पिएगा? यमराज तो दूधा पीने का मुहलत नहीं देता।

सोफिया ने सरल भाव से कहा-क्या अब कुछ नहीं हो सकता डॉक्टर साहब?

गांगुली-बहुत कुछ हो सकता है मिस सोफिया! हम यमराज को परास्त कर देगा। ऐसे प्राणियों का यथार्थ जीवन तो मृत्यु के पीछे ही होता है, जब वह पंचभूतों के संस्कार से रहित हो जाता है। सूरदास अभी नहीं मरेगा, बहुत दिनों तक नहीं मरेगा। हम सब मर जाएगा, कोई कल,कोई परसों; पर सूरदास तो अमर हो गया, उसने तो काल को जीत लिया। अभी तक उसका जीवन पंचभूतों के संस्कार से सीमित था। अब वह प्रसारित होगा, समस्त प्रांत को, समस्त देश को जागृति प्रदान करेगा, हमें कर्मण्यता का, वीरता का आदर्श बताएगा। यह सूरदास की मृत्यु नहीं है सोफी, यह उसकी जीवन-ज्योति का विकास है। हम तो ऐसा ही समझता है।

यह कहकर डॉक्टर गांगुली ने जेब से एक शीशी निकाली और उसमें से कई बूँदें सूरदास का मुँह खोलकर पिला दीं। तत्काल उसका असर दिखाई दिया। सूरदास के विवर्ण मुख-मंडल पर हलकी-हलकी सुरखी दौड़ गई। उसने ऑंखें खोल दीं, इधार-उधार अनिमेष दृष्टि से देखकर हँसा और ग्रामोफोन की-सी कृत्रिाम बैठी हुई, नीरस आवाज से बोला-बस-बस, अब मुझे क्यों मारते हो? तुम जीते, मैं हारा। यह बाजी तुम्हारे हाथ रही, मुझसे खेलते नहीं बना। तुम मँजे हुए खिलाड़ी हो, दम नहीं उखड़ता, खिलाड़ियों को मिलाकर खेलते हो और तुम्हारा उत्साह भी खूब है। हमारा दम उखड़ जाता है, हाँफने लगते हैं और खिलाड़ियों को मिलाकर नहीं खेलते, आपस में झगड़ते हैं, गाली-गलौज, मार-पीट करते हैं, कोई किसी की नहीं मानता। तुम खेलने में निपुण हो, हम अनाड़ी हैं। बस, इतना ही फरक है। तालियाँ क्यों बजाते हो, यह तो जीतनेवालों का धारम नहीं? तुम्हारा धारम तो है हमारी पीठ ठोकना। हम हारे, तो क्या, मैदान से भागे तो नहीं, रोये तो नहीं, धााँधाली तो नहीं की। फिर खेलेंगे, जरा दम ले लेने दो, हार-हारकर तुम्हीं से खेलना सीखेंगे और एक-न-एक दिन हमारी जीत होगी, जरूर होगी।

डॉक्टर गांगुली इस अनर्गल कथन को ऑंखें बंद किए इस भाव से तन्मय होकर सुनते रहे, मानो ब्रह्म-वाक्य सुन रहे हों। तब भक्तिपूर्ण भाव से बोले-बड़ी विशाल आत्मा है। हमारे सारे पारस्परिक, सामाजिक-राजनीतिक जीवन की अत्यंत सुंदर विवेचना कर दी और थोड़े-से शब्दों में।

सोफी ने सूरदास से कहा-सूरदास, कुँवर साहब और रानीजी आए हुए हैं। कुछ कहना चाहते हो?

सूरदास ने उन्मादपूर्ण उत्सुकता से कहा-हाँ-हाँ-हाँ, बहुत कुछ कहना है, कहाँ हैं? उनके चरणों की धाूल मेरे माथे पर लगा दो, तर जाऊँ;नहीं-नहीं, मुझे उठाकर बैठा दो, खोल दो यह पट्टी, मैं खेल चुका, अब मुझे मरहम-पट्टी नहीं चाहिए। रानी कौन, विनयसिंह की माता न?कुँवर साहब उनके पिता न? मुझे बैठा दो, उनके पैरों पर ऑंखें मलूँगा। मेरी ऑंखें खुल जाएँगी। मेरे सिर पर हाथ रखकर असीस दो, माता,अब मेरी जीत होगी। कहो! वह, सामने विनयसिंह और इंद्रदत्ता सिंहासन पर बैठे हुए मुझे बुला रहे हैं। उनके मुख पर कितना तेज है! मैं भी आता हूँ। यहाँ तुम्हारी कुछ सेवा न कर सका। अब वहीं करूँगा। माता-पिता, भाई-बंद, सबको सूरदास का राम-राम, अब जाता हूँ। जो कुछ बना-बिगड़ा हो, छमा करना।

रानी जाह्नवी ने आगे बढ़कर, भक्ति-विह्नल दशा में, सूरदास के पैरों पर सिर रख दिया और फूट-फूटकर रोने लगीं। सूरदास के पैर अश्रु-जल से भीग गए। कुँवर साहब ने ऑंखों पर रूमाल डाल लिया और खड़े-खड़े रोने लगे।

सूरदास की मुखश्री फिर मलिन हो गई। औषधिा का असर मिट गया। ओठ नीले पड़ गए। हाथ-पाँव ठंडे हो गए।

नायकराम गंगाजल लाने दौड़े। जगधार ने सूरदास के समीप जाकर जोर से कहा-सूरदास, मैं हूँ जगधार, मेरा अपराधा क्षमा। यह कहते-कहते आवेग से उसका कंठ रुँधा गया।

सूरदास मुँह से कुछ न बोला, दोनों हाथ जोड़े, ऑंसू की दो बूँदें गालों पर बह आईं, और खिलाड़ी मैदान से चला गया।

क्षण-मात्रा में चारों तरफ खबर फैल गई। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, स्त्राी-पुरुष, बूढ़े-जवान, हजारों की संख्या में निकल पड़े। सब नंगे सिर,नंगे पैर, गले में ऍंगोछियाँ डाले शफाखाने के मैदान में एकत्रा हुए। जिसका कोई नहीं होता, उसके सब होते हैं। सारा शहर उमड़ा चला आता था। सब-के-सब इस खिलाड़ी को एक ऑंख देखना चाहते थे, जिसकी हार में भी जीत का गौरव था। कोई कहता था, सिध्द था; कोई कहता था, वली था; कोई देवता कहता था; पर वह यथार्थ में खिलाड़ी था-वह खिलाड़ी; जिसके माथे पर कभी मैल नहीं आया, जिसने कभी हिम्मत नहीं हारी, जिसने कभी कदम पीछे नहीं हटाए। जीता, तो प्रसन्नचित्ता रहा; हारा, तो प्रसन्नचित्ता रहा; हारा तो जीतनेवाले से कीना नहीं रखा;जीता तो हारनेवाले पर तालियाँ नहीं बजाईं। जिसने खेल में सदैव नीति का पालन किया, कभी धााँधाली नहीं की, कभी द्वंद्वी पर छिपकर चोट नहीं की। भिखारी था, अपंग था, अंधाा था, दीन था, कभी भर-पेट दाना नहीं नसीब हुआ, कभी तन पर वस्त्रा पहनने को नहीं मिला;पर हृदय धौर्य और क्षमा, सत्य और साहस का अगाधा भंडार था। देह पर मांस न था, पर हृदय में विनय, शील और सहानुभूति भरी हुई थी।

हाँ, वह साधाु न था, महात्मा न था, देवता न था, फरिश्ता न था। एक क्षुद्र, शक्तिहीन प्राणी था, चिंताओं और बाधााओं से घिरा हुआ,जिसमें अवगुण भी थे, और गुण भी। गुण कम थे, अवगुण बहुत। क्रोधा, लोभ, मोह, अहंकार, ये सभी दुर्गुण उसके चरित्रा में भरे हुए थे, गुण केवल एक था। किंतु ये सभी दुर्गुण उस पर गुण के सम्पर्क से, नमक की खान में जाकर नमक हो जानेवाली वस्तुओं की भाँति, देवगुणों का रूप धाारण कर लेते थे-क्रोधा सत्क्रोधा हो जाता था, लोभ सदानुराग, मोह सदुत्साह के रूप में प्रकट होता था और अहंकार आत्माभिमान के वेष में! और वह गुण क्या था? न्याय-प्रेम, सत्य-भक्ति, परोपकार, दर्द या उसका जो नाम चाहे, रख लीजिए। अन्याय देखकर उससे न रहा जाता था, अनीति उसके लिए असह्य थी।

मृत देह कितनी धाूमधााम से निकली, इसकी चर्चा करना व्यर्थ है। बाजे-गाजे न थे, हाथी-घोड़े न थे, पर ऑंसू बहानेवाली ऑंखों और कीर्ति-गान करनेवाले मुखों की कमी न थी। बड़ा समारोह था। सूरदास की सबसे बड़ी जीत यह थी कि शत्राुओं को भी उससे शत्राुता न थी। अगर शोक-समाज में सोफिया, गांगुली, जाह्नवी, भरतसिंह, नायकराम, भैरों आदि थे, तो महेंद्रकुमार सिंह, जॉन सेवक, जगधार यहाँ तक कि मि. क्लार्क भी थे। चंदन की चिता बनाई गई थी, उस पर विजय-पताका लहरा रही थी। दाहक्रिया कौन करता? मिठुआ ठीक उसी अवसर पर रोता हुआ आ पहुँचा। सूरदास जीते-जी जो न कर पाया था, मरकर किया!

इसी स्थान पर कई दिन पहले यही शोक-दृश्य दिखाई दिया था। अंतर केवल इतना था कि उस दिन लोगों के हृदय शोक से व्यथित थे,आज विजय-गर्व से परिपूर्ण। वह एक वीरात्मा की वीर मृत्यु थी, यह एक खिलाड़ी की अंतिम लीला। एक बार सूर्य की किरणें चिता पर पड़ीं,उनमें गर्व की आभा थी, मानो आकाश से विजय-गान के स्वर आ रहे हैं।

लौटते समय मि. क्लार्क ने राजा महेंद्रकुमार से कहा-मुझे इसका अफसोस है कि मेरे हाथों से ऐसे अच्छे आदमी की हत्या हुई।

राजा साहब ने कुतूहल से कहा-सौभाग्य कहिए, दुर्भाग्य क्यों?

क्लार्क-नहीं राजा साहब, दुर्भाग्य ही है। हमें आप-जैसे मनुष्य से भय नहीं, भय ऐसे ही मनुष्यों से है, जो जनता के हृदय पर शासन कर सकते हैं। यह राज्य करने का प्रायश्चित्ता है कि इस देश में हम ऐसे आदमियों का वधा करते हैं, जिन्हें इंग्लैंड में हम देव-तुल्य समझते।

सोफिया इसी समय उनके पास से होकर निकली। यह वाक्य उसके कान में पड़ा, बोली-काश, ये शब्द आपके अंत:करण से निकले होते!

यह कहकर वह आगे बढ़ गई। मि. क्लार्क यह व्यंग्य सुनकर बौखला गए, जब्त न कर सके। घोड़ा बढ़ाकर बोले-यह तुम्हारे उस अन्याय का फल है, जो तुमने मेरे साथ किया है।

सोफी आगे बढ़ गई थी। ये शब्द उसके कान में न पड़े।

गगन-मंडल के पथिक, जो मेघ के आवरण से बाहर निकल आए थे, एक-एक करके बिदा हो रहे थे। शव के साथ जानेवाले भी एक-एक करके चले गए। पर सोफिया कहाँ जाती? इसी दुविधाा में खड़ी थी कि इंदु मिल गई। सोफिया ने कहा-इंदु, जरा ठहरो, मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगी।