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Rangbhoomi

रंगभूमि

Rangbhoomi (रंगभूमि) by Premchand is an epic novel about Surdas, a blind beggar who resists British industrialization to protect his ancestral land and community.

Characters:Surdas, John Sevak, Sophia, Raja Bharatsingh, Vinay Singh, Prabhu Sevak
Setting:Colonial India, early 20th century industrial town

Chapter 21 of 50

17 min read • 2,433 words

अध्याय 21: रंगभूमि

सूरदास के आर्तनाद ने महेंद्रकुमार की ख्याति और प्रतिष्ठा को जड़ से हिला दिया। वह आकाश से बातें करनेवाला कीर्ति-भवन क्षण-भर में धाराशायी हो गया। नगर के लोग उनकी सेवाओं को भूल-से गए। उनके उद्योग से नगर का कितना उपकार हुआ था, इसकी किसी को याद ही न रही। नगर की नालियाँ और सड़कें, बगीचे और गलियाँ, उनके अविश्रांत प्रयत्नों की कितनी अनुगृहीत थीं! नगर की शिक्षा और स्वास्थ्य को उन्होंने किस हीनावस्था से उठाकर उन्नति के मार्ग पर लगाया था, इसकी ओर कोई धयान ही न देता था। देखते-देखते युगांतर हो गया। लोग उनके विषय में आलोचनाएँ करते हुए कहते-अब वह जमाना नहीं रहा, जब राजे-रईसों के नाम आदर से लिए जाते थे, जनता को स्वयं ही उनमें भक्ति होती थी। वे दिन बिदा हो गए। ऐश्वर्य-भक्ति प्राचीन काल की राज्य-भक्ति ही का एक अंश थी।

राजा, जागीरदार, यहाँ तक कि अपने जमींदार पर प्रजा सिर कटा देती थी। यह सर्वमान्य नीति-सिध्दांत था कि राजा भोक्ता है, प्रजा भोग्य है। यही सृष्टि का नियम था,लेकिन आज राजा और प्रजा में भोक्ता और भोग्य का सम्बंधा नहीं है, अब सेवक और सेव्य का सम्बंधा है। अब अगर किसी राजा की इज्जत है, तो उसकी सेवा-प्रवृत्तिा के कारण, अन्यथा उसकी दशा दाँतों-तले दबी हुई जिह्ना की-सी है। प्रजा को भी उस पर विश्वास नहीं आता। जब जनता उसी का सम्मान करती है, उसी पर न्योछावर होती है, जिसने अपना सर्वस्व प्रजा पर अर्पित कर दिया हो, जो त्याग-धान का धानी हो। जब तक कोई सेवा-मार्ग पर चलना नहीं सीखता, जनता के दिलों में घर नहीं कर पर पाता।

राजा साहब को अब मालाूम हुआ कि प्रसिध्दि श्वेत वस्त्रा के सदृश है, जिस पर एक धाब्बा भी नहीं छिप सकता। जिस तरफ उनकी मोटर निकल जाती, लोग उन पर आवाजें कसते, यहाँ तक कि कभी-कभी तालियाँ भी पड़तीं। बेचारे बड़ी विपत्तिा में फँसे हुए थे। ख्याति-लाभ करने चले थे, मर्यादा से भी हाथ धाोया। और अवसरों पर इंदु से परामर्श कर लिया करते थे, इससे हृदय को शांति मिलती थी, पर अब वह द्वार भी बंद था। इंदु से सहानुभूति की कोई आशा न थी।

रात के नौ बजे थे। राजा साहब अपने दीवानखाने में बैठे हुए इसी समस्या पर विचार कर रहे थे-लाोग कितने कृतघ्न होते हैं; मैंने अपने जीवन के सात वर्ष उनकी निरंतर सेवा में व्यतीत कर दिए। अपना कितना समय, कितना अनुभव, कितना सुख उनकी नजर किया! उसका मुझे आज यह उपहार मिल रहा है कि एक अंधाा भिखारी मुझे सारे शहर में गालियाँ देता फिरता है और कोई उसकी जबान नहीं पकड़ता,बल्कि लोग उसे और भी उकसाते और उत्तोजित करते हैं। इतने सुव्यवस्थित रूप से अपने इलाके का प्रबंधा करता, तो अब तक निकासी में लाखों रुपये की वृध्दि हो गई होती। एक दिन वह था कि जिधार से निकल जाता था, लोग खड़े हो-होकर सलाम करते थे, सभाओं में मेरा व्याख्यान सुनने के लिए लोग उत्सुक रहते थे और मुझे अंत में बोलने का अवसर मिलता था; और एक दिन यह है कि मुझ पर तालियाँ पड़ती हैं और मेरा स्वाँग निकालने की तैयारियाँ की जाती हैं। अंधो में फिर भी विवेक है, नहीं तो बनारस के शोहदे दिन-दहाड़े मेरा घर लूट लेते।

सहसा अरदली ने आकर मि. क्लार्क का आज्ञा-पत्रा उनके सामने रख दिया। राजा साहब ने चौंककर लिफाफा खोला, तो अवाक् रह गए। विपत्तिा-पर-विपत्तिा! रही-सही इज्जत भी खाक में मिल गई।

चपरासी-हुजूर, कुछ जवाब देंगे?

राजा साहब-जवाब की जरूरत नहीं।

चपरासी-कुछ इनाम नहीं मिला। हुजूर ही...

राजा साहब ने उसे और कुछ न कहने दिया। जेब से एक रुपया निकालकर फेंक दिया। अरदली चला गया।

राजा साहब सोचने लगे-दुष्ट को इनाम माँगते शर्म भी नहीं आती, मानो मेरे नाम कोई धान्यवाद-पत्रा लाए हैं। कुत्तो हैं, और क्या, कुछ न दो, तो काटने दौड़ें, झूठी-सच्ची शिकायतें करें। समझ में नहीं आता, क्लार्क ने क्यों अपना हुक्म मंसूख कर दिया। जॉन सेवक से किसी बात पर अनबन हो गई क्या? शायद सोफ़िया ने क्लार्क को ठुकरा दिया। चलो, यह भी अच्छा ही हुआ। लोग यह तो कहेंगे ही कि अंधो ने राजा साहब को नीचा दिखा दिया; पर इस दुहाई से तो गला छूटेगा।

उनकी दशा इस समय उस आदमी की-सी थी, जो अपने मुँह-जोर घोड़े के भाग जाने पर खुश हो। अब हव्यिों के टूटने का भय तो नहीं रहा। मैं घाटे में नहीं हूँ। अब रूठी रानी भी प्रसन्न हो जाएँगी। इंदु से कहूँगा, मैंने ही मिस्टर क्लार्क से अपना फैसला मंसूख करने के लिए कहा है।

वह कई दिन से इंदु से मिलने न गए थे। अंदर जाते हुए डरते थे कि इंदु के तानों का क्या जवाब दूँगा। इंदु भी इस भय से उनके पास न आती थी कि कहीं फिर मेरे मुँह से कोई अप्रिय शब्द न निकल जाए। प्रत्येक दाम्पत्य-कलह के पश्चात् जब वह उसके कारणों पर शांत हृदय से विचार करती थी, तो उसे ज्ञात होता था कि मैं ही अपराधिान हूँ, और अपने दुराग्रह पर उसे हार्दिक दु:ख होता था। उसकी माता ने बाल्यावस्था ही से पातिव्रत्य का बड़ा ऊँचा आदर्श उसके सम्मुख रहा था। उस आदर्श से गिरने पर वह मन-ही-मन कुढ़ती और अपने को धिाक्कारती थी-मेरा धार्म उनकी आज्ञा का पालन करना है। मुझे तन-मन से उनकी सेवा करनी चाहिए। मेरा सबसे पहलार् कत्ताव्य उनके प्रति है, देश और जाति का स्थान गौण है; पर मेरा दुर्भाग्य बार-बार मुझेर् कत्ताव्य-मार्ग से विचलित कर देता है। मैं इस अंधो के पीछे बरबस उनसे उलझ पड़ी। वह विद्वान हैं, विचारशील हैं। यह मेरी धाृष्टता है कि मैं उनकी अगुआई करने का दावा करती हूँ। जब मैं छोटी-छोटी बातों में मानापमान का विचार करती हूँ, तो उनसे कैसे आशा करूँ कि वह प्रत्येक विषय में निष्पक्ष हो जाएँ।

कई दिन तक मन में यह खिचड़ी पकाते रहने के कारण उसे सूरदास से चिढ़ हो गई। सोचा-इसी अभागे के कारण मैं यह मनस्ताप भोग रही हूँ। इसी ने यह मनोमालिन्य पैदा कराया है। आखिर उस जमीन से मुहल्लेवालों ही का निस्तार होता है न, तो जब उन्हें कोई आपत्तिा नहीं है, तो अंधो की क्यों नानी मरती है! किसी की जमीन पर कोई जबरदस्ती क्यों अधिाकार करे, यह ढकोसला है, और कुछ नहीं। निर्बल जन आदिकाल से ही सताये जाते हैं और सताये जाते रहेंगे। जब यह व्यापक नियम है, तो क्या एक कम, क्या एक ज्यादा।

इन्हीं दिनों सूरदास ने राजा साहब को शहर में बदनाम करना शुरू किया, तो उसके ममत्व का पलड़ा बड़ी तेजी से दूसरी ओर झुका। उसे सूरदास के नाम से चिढ़ हो गई-यह टके का आदमी और इसका इतना साहस कि हम लोगों के सिर चढ़े। अगर साम्यवाद का यही अर्थ है, तो ईश्वर हमें इससे बचाए। यह दिनों का फेर है, नहीं तो इसकी क्या मजाल थी कि हमारे ऊपर छींटे उड़ाता।

इंदु दीन जनों पर दया कर सकती थी-दया में प्रभुत्व का भाव अंतर्हित है-न्याय न कर सकती थी, न्याय की भित्तिा साम्य पर है। सोचती-यह उस बदमाश को पुलिस के हवाले क्यों नहीं कर देते? मुझसे तो यह अपमान न सहा जाता। परिणाम कुछ होता, पर इस समय तो इस बुरी तरह पेश आती कि देखनेवालों के रोयें खड़े हो जाते।

वह इन्हीं कुत्सित विचारों में पड़ी हुई थी कि सोफ़िया ने जाकर उसके सामने राजा साहब पर सूरदास के साथ अन्याय करने का अपराधा लगाया, खुली हुई धामकी दे गई। इंदु को इतना क्रोधा आया कि सूरदास को पाती, तो उसका मुँह नोच लेती। सोफ़िया के जाने के बाद वह क्रोधा में भरी हुई राजा साहब से मिलने आई; पर बाहर मालूम हुआ कि वह कुछ दिन के लिए इलाके पर गए हुए हैं। ये दिन उसने बड़ी बेचैनी में काटे। अफसोस हुआ कि गए और मुझसे पूछा भी नहीं!

राजा साहब जब इलाके से लौटे, तो उन्हें मि. क्लार्क का परवाना मिला। वह उस पर विचार कर रहे थे कि इंदु उनके पास आई और बोली-इलाके पर गए और मुझे खबर तक न हुई, मानो मैं घर में हूँ ही नहीं।

राजा ने लज्जित होकर कहा-ऐसा ही एक जरूरी काम था। एक दिन की भी देर हो जाती, तो इलााके में फौजदारी हो जाती। मुझे अब अनुभव हो रहा है कि ताल्लुकेदारों के अपने इलाके पर न रहने से प्रजा को कितना कष्ट होता है।

'इलाके में रहते, तो कम-से-कम इतनी बदनामी तो न होती।'

'अच्छा, तुम्हें भी मालूम हो गया। तुम्हारा कहना न मानने में मुझसे बड़ी भूल हुई। इस अंधो ने ऐसी विपत्तिा में डाल दिया कि कुछ करते-धारते नहीं बनता। सारे शहर में बदनाम कर रहा है। न जाने शहरवालों को इससे इतनी सहानुभूति कैसे हो गई। मुझे इसकी जरा भी आशंका न थी कि शहरवालों को मेरे विरुध्द खड़ा कर देगा।'

'मैंने तो जब से सुना है कि अंधाा तुम्हें बदनाम कर रहा है, तब से ऐसा क्रोधा आ रहा है कि वश चले, तो उसे जीता चुनवा दूँ।

राजा साहब ने प्रसन्न होकर कहा-तो हम दोनों घूम-घामकर एक ही लक्ष्य पर आ पहुँचे।

'इस दुष्ट को ऐसा दंड देना चाहिए कि उम्र-भर याद रहे।'

'मिस्टर क्लार्क ने इसका फैसला खुद ही कर दिया। सूरदास की जमीन वापस कर दी गई।'

इंदु को ऐसा मालूम हुआ कि जमीन धाँस रही है और मैं उसमें समाई जा रही हूँ। वह दीवार न थाम लेती, तो जरूर गिर पड़ती-सोफ़िया ने मुझे यों नीचा दिखाया है। मेरे साथ वह कूटनीति चली है। हमारी मर्यादा को धाूल में मिलाना चाहती है। चाहती है कि मैं उसके कदम चूमूँ। कदापि नहीं।

उसने राजा साहब से कहा-अब आप क्या करेंगे?

'कुछ नहीं, करना क्या है। सच पूछो, तो मुझे इसका जरा भी दु:ख नहीं है। मेरा तो गला छूट गया।'

'और हेठी कितनी हुई!'

'हेठी जरूर हुई; पर इस बदनामी से अच्छी है।'

इंदु का मुख-मंडल गर्व से तमतमा उठा। बोली-यह बात आपके मुँह से शोभा नहीं देती। यह नेकनामी-बदनामी का प्रश्न नहीं है, अपनी मर्यादा-रक्षा का प्रश्न है। आपकी कुल-मर्यादा पर आघात हुआ है, उसकी रक्षा करना आपका परम धार्म है, चाहे उसके लिए न्याय के सिध्दांताें की बलि ही क्यों न देनी पड़े। मि. क्लार्क की हस्ती ही क्या है, मैं किसी सम्राट् के हाथों भी अपनी मर्यादा की हत्या न होने दूँगी, चाहे इसके लिए मुझे अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि प्राण भी देना पड़े। आप तुरंत गवर्नर को मि. क्लार्क के न्याय-विरुध्द हस्तक्षेप की सूचना दीजिए। हमारे पूर्वजों ने ऍंगरेजों की उस समय प्राण-रक्षा की थी, जब उनकी जानों के लाले पड़े हुए थे। सरकार उन एहसानों को मिटा नहीं सकती। नहीं, आप स्वयं जाकर गवर्नर से मिलिए, उनसे कहिए कि मि. क्लार्क के हस्तक्षेप से मेरा अपमान होगा, मैं जनता की दृष्टि में गिर जाऊँगा और शिक्षित-वर्ग को सरकार में लेश-मात्रा विश्वास न रहेगा। साबित कर दीजिए कि किसी रईस का अपमान करना दिल्लगी नहीं है।

राजा साहब ने चिंतित स्वर में कहा-मि. क्लार्क से सदा के लिए विरोधा हो जाएगा। मुझे आशा नहीं है कि उनके मुकाबले में गवर्नर मेरा पक्ष ले। तुम इन लोगों को जानती नहीं हो। इनकी अफसरी-मातहती दिखाने-भर की है, वास्तव में सब एक हैं। एक जो करता है, सब उसका समर्थन करते हैं। व्यर्थ की हैरानी होगी।

'अगर गवर्नर न सुनें, तो वाइसराय से अपील कीजिए। विलायत जाकर वहाँ के नेताओं से मिलिए। यह कोई छोटी बात नहीं है, आपके सिर पर एक महान् उत्तारदायित्व का भार आ पड़ा है, उसमें जौ-भर भी दबना आपको सदा के लिए कलंकित कर देगा।'

राजा साहब ने एक मिनट तक विचार करके कहा-तुम्हें यहाँ के शिक्षितों का हाल मालूम नहीं है। तुम समझती होगी कि वे मेरी सहायता करेंगे, या कम-से-कम सहानुभूति ही दिखाएँगे; पर जिस दिन मैंने प्रत्यक्ष रूप से मि. क्लार्क की शिकायत की, उसी दिन से लोग मेरे घर आना-जाना छोड़ देंगे। कोई मुँह तक न दिखाएगा। लोग रास्ता कतराकर निकल जाएँगे। इतना ही नहीं, गुप्त रूप से क्लार्क से मेरी शिकायत करेंगे और मुझे हानि पहुँचाने में कोई बात उठा न रखेंगे। हमारे भद्र समाज की नैतिक दुर्बलता अत्यंत लज्जाजनक है। सब-के-सब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के आश्रित हैं। जब तक उन्हें मालूम है कि हुक्काम से मेरी मैत्राी है, तभी तक मेरा आदर-सत्कार करते हैं। जिस दिन उन्हें मालूम होगा कि जिलाधाीश की निगाह मुझसे फिर गई, उसी दिन से मेरे मान-सम्मान की इति समझो। अपने बंधाुओं की यही दुर्बलता और कुटिल स्वार्थ-लोलुपता है, जो हमारे निर्भीक, सत्यवादी और हिम्मत के धानी नेताओं को हताश कर देती है।

राजा साहब ने बहुत हीले-हवाले किए, परिस्थिति का बहुत ही दुराशापूर्ण चित्रा खींचा, लेकिन इंदु अपने धयेय से जौ-भर भी न टली। वह उनके हृदय में उस सोये हुए भाव को जगाना चाहती थी, जो कभी प्रताप और साँगा, टीपू और नाना के नाम पर लहालोट हो जाता था। वह जानती थी कि वह भाव प्रभुत्व-प्रेम की घोर निद्रा में मग्न है, मरा नहीं। बोली-अगर मान लें कि आपकी सारी शंकाएँ पूरी हो जाएँ, आपका सम्मान मिट जाए, सारा शहर आपका दुश्मन हो जाए, हुक्काम आपको संदेह की दृष्टि से देखने लगें, यहाँ तक कि आपके इलाके के जब्त होने की नौबत भी आ जाए, तब भी मैं आपसे यही कहती जाऊँगी, अपने स्थान पर अटल रहिए। यही हमारा क्षात्रा धार्म है। आज ही यह बात समाचार-पत्राों में प्रकाशित हो जाएगी और सारी दुनिया नहीं, तो कम-से-कम समस्त भारत आपकी ओर उत्सुक नेत्राों से देखेगा कि आप जातीय गौरव की कितने धौर्य, साहस और त्याग के साथ रक्षा करते हैं। इस संग्राम में हमारी हार भी महान् विजय का स्थान पाएगी; क्योंकि वह पशु-बल की नहीं, आत्मबल की लड़ाई है। लेकिन मुझे तो पूर्ण विश्वास है कि आपकी शंकाएँ निर्मूल सिध्द होंगी। एक कर्मचारी के अन्याय की फरियाद सरकार के कानों में पहुँचाकर आप उस सुदृढ़ राजभक्ति का परिचय देंगे, सरकार की उस न्याय-रीति पर पूर्ण विश्वास की घोषणा करेंगे, जो साम्राज्य का आधाार है। बालक माता के सामने रोये, हठ करे, मचले; पर माता की ममता क्षण-मात्रा भी कम नहीं होती। मुझे तो निश्चय है कि सरकार अपने न्याय की धााक जमाने के लिए आपका और भी सम्मान करेगी। जातीय आंदोलन के नेता प्राय: उच्च कोटि की उपाधिायों से विभूषित किए जाते हैं, और, कोई कारण नहीं कि आपको भी वही सम्मान न प्राप्त हो।

यह युक्ति राजा साहब को विचारणीय जान पड़ी। बोले-अच्छा, सोचूँगा। इतना कहकर चले गए।

दूसरे दिन सुबह जॉन सेवक राजा साहब से मिलने आए। उन्होंने भी यही सलाह दी कि इस मुआमले में जरा भी न दबना चाहिए। लड़ूँगा तो मैं, आप केवल मेरी पीठ ठोकते जाइएगा। राजा साहब को कुछ ढाढ़स हुआ, एक से दो हुए। संधया समय वह कुँवर साहब से सलाह लेने गए। उनकी भी यही राय हुई। डॉक्टर गांगुली तार द्वारा बुलाए गए। उन्होंने यहाँ तक जोर दिया कि 'आप चुप भी हो जाएँगे, तो मैं व्यवस्थापक सभा में इस विषय को अवश्य उपस्थित करूँगा। सरकार हमारे वाणिज्य-व्यवसाय की ओर इतनी उदासीन नहीं रह सकती। यह न्याय-अन्याय या मानापमान का प्रश्न नहीं है, केवल व्यावसायिक प्रतिस्पधर्ाा का प्रश्न है।'

राजा साहब इंदु से बोले-लो भाई, तुम्हारी ही सलाह पक्की रही। जान पर खेल रहा हूँ।

इंदु ने उन्हें श्रध्दा की दृष्टि से देखकर कहा-ईश्वर ने चाहा तो आपकी विजय ही होगी।