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Shatranj Ke Khiladi

शतरंज के खिलाड़ी

Shatranj Ke Khiladi (शतरंज के खिलाड़ी) by Premchand is a satire where two noblemen play chess while the British annex Awadh in 1856.

Characters:Mirza Sajjad Ali, Mir Roshan Ali, Wajid Ali Shah
Setting:Lucknow, Awadh, 1856 during British annexation

वाजिद अली शाह का समय था। लखनऊ में विलासिता का बोलबाला था।

वाजिद अली शाह का समय था। लखनऊ में विलासिता का बोलबाला था। छोटे-बड़े, अमीर-ग़रीब सभी विलासिता में डूबे हुए थे। कोई नृत्य और संगीत का दीवाना था, कोई शराब का।

मिर्ज़ा सज्जाद अली और मीर रोशन अली दो जागीरदार थे। दोनों में गहरी मित्रता थी। दोनों को शतरंज का व्यसन था। रोज़ाना बैठते और शतरंज खेला करते।

शतरंज की दीवानगी

मिर्ज़ा के घर में पहले शतरंज की बैठक होती थी। बेगम साहिबा को ये दीवानगी बुरी लगती थी। घंटों बैठे शह और मात में मग्न रहते। खाने का होश नहीं, पीने की सुध नहीं।

एक दिन बेगम ने उलाहना दिया—"यह कैसी बेहूदा खेल है! न घर का होश, न द्वार का। सुबह बैठ जाते हो, रात को उठते हो।"

मिर्ज़ा ने कहा—"क्या करूँ, शतरंज छोड़ना मेरे वश की बात नहीं। यह तो बड़े-बड़े बादशाहों का खेल है।"

आखिर तंग आकर दोनों ने एक नई जगह ढूँढ़ी—गाँव के बाहर एक पुरानी मस्जिद।

अवध पर संकट

उन दिनों अवध पर अंग्रेज़ों का संकट मँडरा रहा था। कंपनी सरकार अवध को हड़पने की तैयारी में थी। लॉर्ड डलहौज़ी की नज़र अवध पर थी।

वाजिद अली शाह को अपने सिंहासन की चिंता थी, लेकिन वे कुछ कर नहीं पा रहे थे। राज्य की सेना भी कमज़ोर थी।

मगर हमारे दोनों खिलाड़ियों को इसकी ज़रा भी परवाह नहीं थी। वे तो अपने मोहरों में मगन थे।

अवध का पतन

आख़िर वह दिन आ गया। कंपनी की फ़ौज ने लखनऊ को घेर लिया। वाजिद अली शाह गिरफ़्तार कर लिए गए।

लखनऊ की गलियों में अंग्रेज़ी सिपाही घूम रहे थे। लोग भाग रहे थे, रो रहे थे।

और हमारे दोनों नवाब? वे उसी खंडहर मस्जिद में बैठे शतरंज खेल रहे थे।

"शह!"

"और यह रहा मात!"

अंतिम बाज़ी

खेल के बीच में ही दोनों में झगड़ा हो गया। एक ने दूसरे पर धोखे का इलज़ाम लगाया।

दोनों उठ खड़े हुए। तलवारें निकल आईं।

कुछ ही पलों में दोनों ज़मीन पर गिरे पड़े थे—एक दूसरे के हाथों मारे गए।

और शतरंज की बिसात वैसी ही बिछी रही—मोहरे अपनी जगह पर थे, मानो कह रहे हों कि खेल तो अभी बाक़ी है।


~ समाप्त ~