दुखी चमार द्वार पर झाड़ू लगा रहा था। उसकी बेटी की सगाई होने वाली थी और उसे पंडित घासीराम से शुभ मुहूर्त निकलवाना था।
पंडित का घर
दुखी पंडित के घर गया। पंडित ने कहा - पहले यह लकड़ी काट दो, फिर मुहूर्त निकाल दूंगा।
दुखी ने देखा - एक बड़ा मोटा पेड़ का तना पड़ा था। उसे काटना आसान नहीं था। लेकिन दुखी ने हां कर दी।
अंतहीन काम
दुखी सुबह से शाम तक लकड़ी काटता रहा। भूख-प्यास से बेहाल था, लेकिन पंडित ने उसे न खाना दिया, न पानी।
शाम होते-होते दुखी की तबीयत खराब हो गई। वह चक्कर खाकर गिर पड़ा।
दुखद अंत
अगली सुबह जब लोग उठे तो देखा - दुखी मरा पड़ा था। पंडित ने उसकी लाश को भी नहीं छुआ। आखिर एक कुत्ते ने उसकी लाश को घसीटकर बाहर फेंका।
यही थी दुखी की 'सद्गति' - एक दलित की नियति।