बचपन में मेरा सबसे अच्छा दोस्त गया था। हम साथ खेलते थे, साथ पढ़ते थे। गिल्ली-डंडा हमारा प्रिय खेल था।
बचपन के दिन
गया गरीब घर का था, मैं अमीर घर का। लेकिन बचपन में इसका कोई मतलब नहीं था। हम दोनों बराबर थे।
गया गिल्ली-डंडा मुझसे अच्छा खेलता था। मैं हमेशा हारता था और बहाने बनाता था। गया कभी नहीं चिढ़ता।
साल बीते
फिर हम बड़े हुए। मैं पढ़-लिखकर बड़ा अफसर बन गया। गया वहीं रहा - गांव में, गरीबी में।
बीस साल बाद मैं गांव गया। गया मिला - बूढ़ा, कमज़ोर। उसने मुझे पहचाना और कहा - आओ भैया, एक बार फिर खेलें।
वही खेल
हमने खेला। इस बार भी मैं हारा। लेकिन इस बार गया ने कहा - भैया, अब तो आप बड़े साहब हैं, आप ही जीते।
मेरी आंखों में आंसू आ गए। वही गया था - निश्छल, प्यारा।
बचपन की दोस्ती में कोई ऊंच-नीच नहीं होती।